जय जय हरि, पावन प्यारे
तुम हो सबके पालनहारे।
जो हर दिल के भीतर बसते
भवसागर से पार हैं करते॥
निर्गुण भी तुम, निराकार
तुमसे चलता सारा संसार।
हे हरि! अपनी शरण में रखना
हम पर अपनी दया बरसाना॥
हे हरि! हे परमात्मा
तुम निर्मल ज्ञान का रूप।
न जन्म तुम्हारा, न कोई अन्त
सदा अमर तुम्हारा स्वरूप॥
जहाँ तुम्हारा पावन वास
वहाँ न कोई डर या नाश।
वेद भी इतना ही कहते
तुम हर समय सदा ही रहते॥
ज्ञानी जन जिस शक्ति को
प्यार से हरि नाम पुकारें।
वही अमर परम सत्य हो तुम
जो हम सबके मन में विहारें॥
रूप, रंग और नाम से आगे
फिर भी सबके साथ हो तुम।
सदा एक जैसे रहने वाले
सब जीवों के मीत हो तुम॥
हे हरि! हरि! पावन प्यारे
तुम ही सबके भाग्य सँवारे।
जीवन की इस कठिन नदी से
हमें पार ले जाने वाले॥
तुम सबसे ऊँचे, सबसे न्यारे
मन के भीतर रहने वाले।
साक्षी बनकर जग को देखते
समय बने सब मिटाने वाले॥
मूल प्रकृति, जीव और समय
दिखते हैं रूप तुम्हारे।
सबके साथ खेलते फिर भी
सबसे अलग हो पालनहारे॥
जैसे फूलों की खुशबू आकर
बिन छुए मन को महकाए।
वैसे तुम्हारी पास होने की
शक्ति प्रकृति को जगाए॥
तुम न बदलते, तुम न मिटते
तुम्हारा न आरम्भ न अन्त।
हरि चरणों में नमन हमारा
तुम हो स्वामी सदा अनन्त॥
न था दिन और न थी रात
न धरती थी, न था आकाश।
न अँधेरा, न कोई उजाला
केवल था तुम्हारा प्रकाश॥
उस पहली शक्ति से फिर
तीन तरह का अहंकार हुआ।
सात्त्विक, राजस और तामस
इनसे जग का विस्तार हुआ॥
जल के ऊपर एक बड़ा अण्ड
बुलबुले जैसा बनकर आया।
सात परतों से ढका हुआ था
उसमें पूरा जग समाया॥
ब्रह्मा बनकर जग को रचते
विष्णु बनकर पालन करते।
रुद्र रूप में समय आने पर
सारी सृष्टि का अन्त हैं करते॥
तुम ही सारे जग का रूप
तुम ही जग के आधार।
छोटे से भी छोटे कण में
तुम्हारा फैला है संसार॥
दिखने वाला, छिपा हुआ जग
जीव और चलता हुआ समय।
इन सबसे भी आगे हो तुम
तुमसे चलता जग का नियम॥
जो तुम्हें अपने मन में रखता
वह पाता है परम किनारा।
हे दया के सागर हरि
सुन लो आज पुकार हमारा॥
हे हरि! हरि! तुम्हें मैं ध्याऊँ
चरण-कमल मन बीच बसाऊँ।
तुम बिन मेरा कोई न दूजा
तेरे आगे शीश झुकाऊँ॥
माया-मोह के झूठे बन्धन
हरि नाम से दूर भगाऊँ।
जन्म-मरण का चक्कर मिटाकर
तेरे चरणों में सुख पाऊँ॥
हरि नाम मन में बसाए रखूँ
हर पल तेरा ध्यान लगाऊँ।
तेरी दया से जीवन सँवरे
हरि-हरि कहता तुम तक आऊँ॥