विष्णु-विष्णु गाइये, विष्णु जग के आधार।
प्रकृति-पुरुष-काल-जगत, उनके चार आकार॥
सृष्टि के हर कण में बसते, सबके पालनहार।
विष्णु नाम का ध्यान करें, हो जीवन भव से पार॥
जब प्रकृति बिल्कुल शान्त थी, पुरुष रहे सबसे दूर।
तब काल बने विष्णु प्रभु ने, जग में हलचल की भरपूर॥
जैसे फूलों की खुशबू से, मन में भाव जग जाते।
वैसे विष्णु पास रहें तो, प्रकृति में बदलाव आते॥
प्रकृति में हलचल होते ही, महान तत्त्व जन्मा अपार।
सत-रज-तम के तीन गुणों ने, पाया अपना रूप विस्तार॥
उससे तीन अहंकार बने, सात्त्विक, राजस, तामस नाम।
तम से भूत, रज से इन्द्रियाँ, सत से देवों का धाम॥
शब्द से पहले नभ बना, नभ से स्पर्श और फिर वायु।
वायु से अग्नि-रूप बना, अग्नि से जल पाया आयु॥
जल से गन्ध का गुण आया, फिर धरती का रूप बना।
पाँचों सूक्ष्म गुणों से मिलकर, सारा संसार बना॥
शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, हर तत्त्व में होते साथ।
विष्णु की इस अद्भुत माया से, जुड़ा हुआ है पूरा संसार॥
एक-दूजे के सहारे से, सभी तत्त्व आपस में मिले।
प्रभु की कृपा पाकर उनसे, ब्रह्माण्ड के रूप खिले॥
जल के ऊपर बड़ा-सा अण्डा, बुलबुले जैसा फैला अपार।
सात परत से घिरा हुआ था, प्रकृति का सुन्दर विस्तार॥
सुमेरु उसमें बीच खड़ा था, पर्वत उसके अंग समान।
सागर उसमें जीवन-रस थे, अद्भुत था प्रभु का निर्माण॥
उस अण्डे में विष्णु प्रभु ने, ब्रह्मा जैसा रूप लिया।
रज गुण लेकर सारी दुनिया, रचने का शुभ काम किया॥
पर्वत, द्वीप, समुद्र और नदियाँ, ग्रह-तारे सब रच डाले।
देव, दानव, मानव, पशु, पेड़, जीवन के सब रूप निराले॥
सृष्टि रचाकर विष्णु प्रभु ने, पालन का फिर काम किया।
हर युग में धर्म बचाने को, भक्तों का हर दुख हर लिया॥
जब-जब धरती पर अधर्म बढ़ा, भक्तों ने उनको पुकारा।
विष्णु ने अवतार लिया और, दुष्टों से संसार उबारा॥
जब सृष्टि की रात है आती, विष्णु रुद्र का रूप बनाते।
सारे जग को अपने अन्दर, लेकर जल में फिर मिलाते॥
शेषनाग की शय्या पर वे, अपनी इच्छा से सो जाते।
फिर जागकर नई सृष्टि का, सुन्दर चक्र पुनः चलाते॥
विष्णु-विष्णु जपता रहूँ मैं, तन-मन सब तुमको अर्पण।
सृष्टि, पालन और विनाश का, तुम ही करते सारा संचालन॥
मन का घमंड छोड़कर प्रभु, चरण-कमल की शरण में आऊँ।
सूक्ष्म रूप और विराट रूप में, केवल तुमको ही मैं पाऊँ॥
विष्णु नाम अनमोल है, काटे मृत्यु के सब फन्द।
मैं बालक हूँ तेरा विष्णु, रखना मुझको अपने संग॥
हर साँस में नाम तुम्हारा, हर धड़कन में तेरा प्यार।
विष्णु-विष्णु गाता जाऊँ, तुम ही मेरे पालनहार॥